"सफर-ए-वियोग"

"सफर-ए-वियोग"

दिल में कुछ अजनबी रोग लिए बैठा हूँ,
ज़िन्दगी में कुछ मतलबी लोग लिए बैठा हूँ।

वो संग-ए-दिल मेरी खुशियों का क़ातिल,
मैं हैरान उस पे सौ सोग लिए बैठा हूँ।

ना दर, ना दीद, और वो इश्क़-ए-ख़ुदा,
मैं किस बेवफ़ा का जोग लिए बैठा हूँ।

हर मोड़ पे छल, हर राह पे तन्हाई है,
मैं ज़ख़्मों का ही अनुरोग लिए बैठा हूँ।

वो छोड़ के मुझको गैरों का हो बैठा है,
मैं सफ़र-ए-इश्क़ में वियोग लिए बैठा हूँ।

"अरकान" क्या कहे कोई हाल-ए-दिल अपना,
मैं अरमानों का परितोग लिए बैठा हूँ।

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