"मेरे अल्फ़ाज़"
उन्होंने कहा कि...
ये भी कोई उम्र है ये सब पहनने की
और तुमने अपने मन को मार लिया
उन्होंने कहा...
पता भी है तुम एक विधवा हो
और तुमने मेहंदी लगवाने के लिये
आगे बढी अपनी हथेली को
पीछे खींच लिया,,,
उन्होंने कहा कि...
साडी में तुम गँवार दिखती हो
और तुमने चाव से खरीदा
साडी का पैकेट वापिस कर दिया,,,
उन्होंने कहा कि...
अब तुम्हारे मोटापे पर कुछ नहीं जँचता
और तुमने भरोसा कर लिया,,,
उन्होंने जो चश्मा पहनाया
उसी से खुद को देख लिया,,,
उन्होंने तुम्हें, तुममें उलझाया
और तुम उलझ गयीं!
सुनो.....
ध्यान से देखो
ये तुम हो !
उम्र कुछ भी हो
वक्त कैसा भी हो
लम्बी सांस लो
खुद में विश्वास भरो
और याद करो कि
तुम 'पापा की परी' हो !
कि परियाँ कभी सधवा,
विधवा, मोटी, काली,
भद्दी, बेडौल, बदसूरत नहीं होतीं
कि सुन्दर महसूस करने के लिये
किसी और की रज़ामंदी की जरूरत कहां
सभी महिला मित्रों को समर्पित
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